Thursday, August 07, 2008

The Painted Veil-पतिता.

Painted Veil.
By.
Somsent mom


पतिता.
लेखक ; सोँमसेंट मोँम
* ओहदा जब तक भी बना रहे बडा ही होता है । जब भी किसी बडे औहदे का कोई व्यक्ति किसी जगह जाता है तो बैठे हुए लोग खडे होकर उसका अभिवादन करते है, स्वागत करते है । परंतु एक रिटायर्ड गवर्नर को कौन पूछता है ?
* वह पहले से अधिक शांत हो गया था । चूँ’कि वह पहले ही से शांत प्रकृति का पुरुष था अत: घर में किसी ने भी उसकी बढी हुई शांत प्रवृति पर ध्यान न दिया । उसकी लडकियों ने उसे आमदनी का सहारा मात्र ही समजा था । उनकें विचारों में पिता का काम दर-दर भटक कर उनके लिए सुख-सुविधा,वस्त्र, रहने की व्यवस्था और खर्च का ईन्तजाम करना था । अब यह समझकर कि उसी की गलतिंयो से घर की आमदानी घट गयी है, उनमें उसके लिए घृणा का भाव भर गया था । कभी भी उन्होंने उस निरीह व्यक्ति के सम्बन्ध में अधिक कुछ नहीं जानना चाहा । वह जो तडके—सवेरे घर से निकल जाता था और रात गये खाना खाने कि लिए आता था : ईससे बर्नाड अपने घर में ही अजनबी बन गया था ।
* “तुमने कभी प्रकट तो नहीं किया ।“
“हाँ ! मेरा तरिका थोडा असभ्य रहा ; जिन बांतों का मै मुल्य समझता हूँ अधिकतर उनके सम्बन्ध में कुछ नहीं बोलता ।“
* उसके बेतुके आत्म-नियन्त्रण से ऊब गयी थी । आत्म-नियन्त्रण उस अवस्था में तो ठीक है जब कोई स्वयम में रह जाना चाहता हो,---और अपने स्वयम के अतिरिक्त अन्य कोई दायित्व न हो ।
* वाल्टर ने कहा, “तुम्हारे प्रति मैने बहुत बडी बांते नहीं सोची थी । मैने स्वप्न नहीं देखे थे । मै जानता था कि तुम मूर्ख, बेकार और उजड लडकी थीं । फिर भी मैंने तुमसे प्रेम किया । मै जानता था कि तुम्हारी आदतें और काम सब बजारु थे, परंतु मैने तुमसे प्रेम किया । मै जानता था कि तुम ऊँचे स्तर की नहीं हों, तब भी मैने तुमसे प्रेम कियां मैं आज सोचता हूँ तो हँसी आती है कि जो तुमने चाहा, उसे मुझे चाहना पडा है । मै तुम्हे जताना चाहता था कि मै बैवकूफ, अशिष्ट नहीं हूं । बदनामी फैलाना नही चाहता । “मुझे मालूम था कि बुध्धि से तुम्हें घृणा है फिर भी मैंने सारे काम तुमने जैसे चाहे बिल्कुल वैसे ही किये; मैने तुम्हें पूरी तरह सोच लेने दिये कि जैसे अन्य पुरुषों को तुम बुध्धु समझती हो, मुझे भी समझो । मुझे यह भी पता है कि तुमने अपनी सुविधा के कारण ही मुझसे विवाह किया । ईस सब को भुलाकर मैंने तुम्हें चाहा है ।जब मैनें देखा कि तुम मेरे प्रेम का प्रतिदान नहीं दे रही हो तो । और लोग तो कुछ से कुछ हो जाते है, मैंने ऎसा कुछ नहीं किया । मैंने अपने प्रेम का प्रतिदान तुमसे कभी चाहा ही नहीं । मेरी समझ भी नहीं आया कि प्रतिदान दो भी तो क्यों ? मैने स्वयम को कभी भी प्रेम के योग्य नहीं माना । मैं तुमसे प्रेम करता था यही मेरे लिए बहुत था । जब कभी तुम्हारी आँखो में भूले-से भी म्रेरे प्रति स्नेह उमडता, उसे देख मैं फूला नहीं समाता था । मैने कभी भी अपने प्रेम को तुम पर भार नहीं बनने दिया । जब कभी तुम में उकताहट आती
मैं तुरन्त ही भाँप जाता बहुत से पति जिसे अपना अधिकार मानते है, उसे मैंने केवल उपकार समझा ।“
* केवल सताईस वर्ष की अवस्था में ही मृत्यु पा लेना दुर्भाग्य नहीं, तो और क्या है ?
* “संसार में मूर्खोँ की कमी नहीं है । और जब कोई अच्छे ओहदे पर हो और वह आपसे कोई वायदा कर ले, पूरा न करे और आपके पीछे आपकी बुराई करे, ऎसे व्यक्ति साधारणतय: चतुर समझे जाते है । --और फिर उसकी पत्नि भी तो है । वह सचमुच एक कुशल नारी है । उसकी बातें मानने योग्य होती है । चार्ली जब तक उसके कहे में है, तब तक ही उसकी कुशल भी है, और सरकारी-नौकरी पाने से पहले कहीं सुघड पत्नि मिल जाये, तो सोने पर सुहागा हो जाये । सरकार कभी भी योग्य या चतुर व्यक्ति नहीं चाहती, न उसे नित्य नये-नये विचारों की आवश्यकता होती है, बल्कि उससे तो सरकार को असुविधा ही हाती है । ईसके विपरीत सरकार को आकर्षक एवम चलते-पुर्ज व्यक्ति चाहिएँ जो दिमाग से काम न लें और सरकारी काम में कोई बडी बाधा या गलती न हो । चार्ली जरुर शिखर तक पहुँचेगा ।“
*”बात यह है कि आप और में शायद दो ही ऎसे व्यक्ति है जो यहां की जमीन पर शांति और बेफिक्री से घूमते है । नन स्वर्ग में विचरती है और आपके पति महोदय ! –अन्धकार में ।“
* “मै उसका आदर करता हूँ । उस व्यक्ति में चरित्र है और बुध्धि भी । और यह आपको मालुम होना चाहिए कि चरित्र और बुध्धि का मेल दुर्लभ होता है ।
*”कितना बीभत्स है ?”
“क्या ? मृत्यु ?”
“जी ! मृत्यु हर वस्तु को कितना छोटा बना देती है । यह जो कभी व्यक्ति था । अब वैसा नही लगता । ईसकी और देख कर कौन कहेगा कि यह कभी जीवित भी था । कौन ईसे देख कर सोचेगा कि वर्षो पहले यह भी छोटा-सा-बालक था जो ईस पहाडी पर दौडा करता था और दौड-दौड कर पतंग उडाता था ।“ और किटी का कण्ठ अवरुध्ध हो गया.
* नदी धीमे बह रही थी पर तब भी उसमें गति थी,---उसमें जीवन था । यह देख कर भान होता था कि हर वस्तु का रुप बदल जाता है, पर गति नहीं रुकती जीवन विधमाने रहता है । वस्तुएँ समाप्त हो जाती है, पर अपना चिन्ह छोड जाती है । किटी ने सोचा कि सारा-का-सारा मानव-समुदाय नदी मे पानी के बिन्दुओं के समान है और नदी अपने साथ उन बिन्दुओं को बहाये लिए जा रही है । हर बूँद बिल्कुल एक-दूसरी से जुडी-बँधी है, फिर भी दोनों में दूरी है । बूँदों का ईतना व्यापक और नियन्त्रित स्वरुप भी सागर की और नदी बहाकर लिये जा रही है । उसने सोचा जब जीवन का अर्थ केवल ईतना सा है तो मनुष्य की यह मूर्खता ही तो है कि वह छोटी-छोटी बातों को बेकार महत्व देकर अपना जीवन दु:खी बना लेता है ।
* “देखिए, हममें से कुछ तो समझते है कि अफीम के नशे में वह रहस्य निहित है,--कुछ सोचते है कि अध्यात्म के पथ पर चल कर उसे जाना जा सकता है—कुछ लोगों का विचार है कि वह मदिरा में मिलता है और कुछ उसे प्रेम में ढूंढते है । परंतु ईन सबसे कुछ हासिल नहीं हो पाता ।“
* “मेरे पिता जी के लिए यह सूचना कठोर आघात थी । मैं उनकी एक ही लडकी थी और पुरुष साधारणतय: बेटों से अधिक बैटियों से स्नेह करते है ।“
* “हदय होना भी दुर्भाग्य ही है।“
* “हदय जीतने का केवल एक ही मार्ग है कि जिसे जीतना है उसका-सा बन जाओ ।“
* जीवन केवल परीक्षा है, जिसमें उन्होंने उतीर्ण होना है. उनके हदय में केवल एक विश्वास है, एक लगन है---एक ध्यान है कि एक दिन वह वहाँ पहुँच जाँयेगी जहाँ उन्हें शाश्वत जीवन मिलेगा ।
किटी ने अपने हाथ बाँधकर वैडिगटन की और देखा ।
”अच्छा थोडी देर को मानिये कि ईस दुनिया के बाद कोई जीवन नहीं है—तब क्या मृत्यु हर बात का अन्त नहीं कर देती ? तब क्या उन ननों ने अकारण ही सारा त्याग नहीं किया ? क्या वह ठगी नहीं गयीं ?”
*”मैं नहीं समझता कि उन्होंने अपना ध्येय स्वन्पिल माना है । उनका जीवन उनके लिए बडा रोचक है । मै तो मानता हूँ कि कभी कभी मानव अपने जीवन में कुछ ऎसा सुन्दर कर दिखाता है कि उसमें उसका मन लगा रहता है, नहीं तो संसार में मन लगाने को कुछ है ही नहीं । मानव कभी चित्र बनाता है,---कभी संगीत रचना करता है । कभी साहित्य सृजन करता है और ईस तरह जीवन बिता लेता है । ईन सबसे अधिक सुन्दर है सुखद और सुन्दर जीवन बिता पाना । वही कला की सर्वोत्कृष्ट देन है ।“
* “देखिए आर्केस्ट्रा में हर वादक अपना-अपना साज बजाता है ।
* “कुछ नहीं ! पथ और पंथी की बात थी । यही कि हर जीव उस मार्ग पर चलता है पर वह मार्ग किसी जीव ने नहीं बनाया । पथ स्वयम बना है । वह सब कुछ है और कुछ भी नहीं । उसी ने सबका उदभव है,--उसी में सब फिर समा जाते है । वह बिना कोण का एक चौखटा है,--वह एक आवाज है जिसे कान नहीं सुन पाते—वह एक मूर्ति है पर जिसका कोई आकार नहीं है । वह जाल है,---पर उसका हर फन्दा एक-एक सागर के बराबर बडा है । वह एक ऎसा विश्राम-स्थल है जहाँ हर किसी को आराम मिलता है । वह कहीं नहीं है,--पर फिर भी आप उसे देख सकती है । आप चाहें न चाहें पर हर नियत घटना घटती रहती है । जो निभ जाता है उसका भला होता है,--जो झुका जाता है उसे सीधा कर दिया जाता है । असफलता सफलता का आधार है । और सफलता में असफलता निहित है । परंतु कौन जाने कि मोड कहाँ आता है ? आक्रमण को विजय मिलती है पर बचने वाले को सफलता मिलती है । वही शक्तिशाली है जो स्वयम को जीत ले ।“
* उसने सोचा सभी के अन्तर में कुछ ऎसे रहस्य होते है जो हर कोई दूसरों से छिपा कर रखना चाहता है ।

Read Novel review : The Painted Veil

Labels:

Friday, July 11, 2008

My apprenticeship.By Maxim Gorky. जीवन के पथ पर.

The

My apprenticeship.
By.
Maxim Gorky.
जीवन के पथ पर.
लेखक : मेकसीम गोर्की
,


*
मैने देखा है कि सगे-सम्बन्धी एक-दूसरे से जितना बुरा व्यवहार करते है, उतना अजनबी भी नहीं कर पाते एक-दूसरे की कमजोरियों और बेहुदगियों को जितना अधिक वे जानते है, उतना कोई बाहरी व्यक्ति कैसे जान सकता है
*
सुखी दिन गुजर जाते है, अच्छे लोग गुजर जाते है...
*
भाग्य, मेरे भाई, उस पत्थर की भांति है जो गले में बंधा रहता है तुम उबरने के लिए हाथ-पांव मारते हो, और वह तुम्हें ले डूबता है....."
* "
बिना लगाम के घोडा और बिना भगवान के भय का व्यक्ति, दोनो एक से है भगवान के सिवा और कौन हमारा मीत हो सकता है ? व्यक्ति का सबसे बडा शत्रु है व्यक्ति ! "
* "
छोड दो यह बिना अर्थ का धंधा, छोड दो ! चिडियां पकडकर विश्व में आज तक कोई आगे नहीं बढा ! अपने लिए कोई ठिकाना खोजो और दिमाग की समूची शक्ति से एक जगह जमकर काम करो व्यक्ति का जीवन ईसलिए नहीं है कि उसे ओछी बातों में नष्ट किया जाए वह भगवान का बीज है और अच्छी फसल पैदा करना उसका काम है ! व्यक्ति सिक्के की भांति है यदी उसे ठीक ढंग से काम में लाया जाए तो वह अपने साथ और सिक्कों को भी खींच लाता है क्या तुम जीवन को आसान समझते हो ? नही, वह एक कठोर चीज है, बहुत ही कठोर ! विश्व अंधेरी रात के समान है जिसमें हर व्यक्ति को स्वयं मशाल बनकर अपने लिए उजाला करना होता है भगवान ने हम सभी को समान रुप से दस उंगलियां दी है, परंतु हर व्यक्ति दूर-दूर तक अपने पंजों को फैलाना और सभी कुछ दबोच लेना चाहता है अपनी शक्ति दिखानी चाहिए, यदी शक्ति नहीं है तो चालाकी दिखाओ जो बडा नहीं, बलवान नहीं-वह तो स्वर्ग में पहुंचेगा, नरक में लोगों के साथ मेल-जोल रखना, परंतु यह कभी भूलना कि तुम अकेले हो बात सबकी सुनना, परंतु विश्वास किसी पर करना आंखो देखी बात भी झुठी हो सकती है जबान मुंह में रखना- घर और शहर जबान सें नहीं, रुपये और हथौडे से बनते है तुम तो खानाबदोश बश्कीर है, काल्मीक जिंनकी सारी पूंजी है जुंएं और भेडें !...."
*
दूसरों की छीछालेदर कसना, उनके नुकस निकालकर रखना, एक ऎसा मनोरंजन है जिस पर कुछ खर्च नहीं करना पडता, और बे-पैसे का यह मनोरंजन ही उनका एकमात्र मन-बहलाब था ऎसा मालूम होता मानो ऎसा करके वे खुद अपने जीवन की ऊब, नेकचलनी और घिसघिस का बदला चुका रहे हों
*
रोकाम्बोल ने मुझे सिखाया कि परिस्थितियों की शक्ति से लोहा लो, उन के सामने कभी झुको
* "
सूअर सभी कुछ खा सकता है--चाहे उसके अपने बच्चे-कच्चे या भाई-बहन ही क्यों हो..."
* "
ये सौदागर भी क्या जीवन बिताते है ? मुझे उनका ढर्रा जरा भी अच्छा नही लगता "
दाढी की लट को उसने अपनी उंगली में लपेटा और पूछने लगा :
"तुझे क्या मालूम कि वे कैसा जीवन बिताते है ? क्या तू उनके घरों में जाता रहता है ? यह तो बाजार है, मेरे लडके, और लोग बाजार में जीवन नहीं बिताते बाजार में तो वे व्यापार करते है, या घर पहुंचने की जल्दी में तेजी से डग उठाते हुए गुजर जाते है ! बाजार में लोग कपडों से लदे-फंदे रहते है और कुछ पता नहीं चलता कि भीतर से वे कैसे है केवल घर ही एक ऎसी जगह है जहां, अपनी चार दीवारों के भीतर, व्यक्ति उन्मुकत जीवन बिताता है अब तू ही बता क्या तूने यह जीवन देखा है ?"
"
परंतु उनके विचारों में तो ईससे अन्तर नहीं पडता घर हो चाहे बाहर, वे एक से रहते है "
"
यह कोई कैसे बता सकता है कि हमारा पडोसी किस समय क्या सोचता है ?" बूढे ने कडी नजर से मुझे घूरकर देखा और वजनदार आवाज में बोला "विचार जूओं की भांती है, उन्हे गिना नहीं जा सकता--बडे बूढों ने यों ही यह नहीं कहा है हो सकता है जब व्यक्ति घर लौटकर देव-प्रतिमा के सामने घुटने टेककर मिनमिनाता या आंसु बहाते हुए प्रार्थना करता हो : मुझे क्षमा करना, महाप्रभु, आज तुम्हारे पवित्र दिन मैने पाप किया है !' संभव है कि उसके लिए घर मठ के समान हो प्रभु के सिवा अन्य किसी चीज से उसका लगाव नहीं समझा ! हर मकडी को भगवान ने एक कोना दिया है--खुब जाल बुनो, परंतु अपना वजन पहचानते हुए , ऎसा हो कि वह तुम्हारा वजन संभाल सके...
* "
अब तूने ईतनी छोटी उम्र में ही बाल की खाल निकालना शरु कर दिया है दिमाग के सहारे नहीं, ईस उम्र में तुझे आंखों के सहारे जीना चाहिए ! दूसरे शब्दों में यह कि देख और दिमाग में बटोर रख और जबान पर लगाम कसे रख दिमाग व्यापार के लिए है, विश्वास आत्मा के लिए पुस्तके पढना अच्छी बात है, परंतु हर वस्तु की अपनी एक सीमा होती है कुछ लोग ईतना पढते है कि उनका अपना कोई दिमाग रहता है, भगवान रहता है वे ईन दोनों से हाथ धों बैठते
*
यहां तक कि बडे-बडे लोग भी सत्य के बजाय काल्पनिक कहानियां ज्यादा पसंद करते थे मै साफ देखता कि कहानी जितनी ही अधिक अनहोनी तथा अघट घटनाओं से भरी होती, उतना ही अधिक ध्यान से वे उसे सुनते मोटे तौर से यह कि वास्तविककता मे6 उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी सब भविष्य के रंगीन सपने देखना और वर्तमान के भोंडेपन तथा निर्धनता पर भविष्य की सुनहरी चादर डालकर उसे आंखों की ओट करना चाहते
*"
जीवन की दलदल में हम उन पिल्लों की भांति घिसटते है जिनकी आँखे कभी नहीं खुलतीं क्यों और किसलिए, यह कोई नही जानता भगवान को हमारी जरुरत है, राक्षस को और कहा यह जाता है कि हम भगवान के सेवक है
*
मै तुझसे कहता था कि धन का अपने आप में कोई महत्व नहीं है अपने आप में वह बेकार है महत्व की चीज धन नहीं, बल्कि वह है जो धन से उत्पन्न होती है, या जिसके लिए धन का उपयोग किया जाता है...
* "
लोगों के लिए किसी के हदय में तरस नहीं है भगवान उन पर तरस खाता है, वे स्वयं अपने पर...".
*
कुबडे वैसे सभी दिमाग के तेज और खूब चतुर होते है |
* हा, वह भला व्यक्ति है, काहिल लोगों के लिए भला बनना सबसे बडा आसान काम है । समझे ब बचुआ, दिमागी पूंजी का जब दिवाला निकल जाता है, तभी व्यक्ति भला बनता है !
*
उसकी बातों कों मन में बैठाने की जरुरत नहीं । तुम लोंग सभी कम उम्र हों, और सारा जीवन तुम्हें
पार करना है । दिमाग का कौठा स्वयं अपना विचारों से भरता जाओ ! उधार लिए सौ विचारो से अपना एक विचार कही ज्यादा किंमती होता है,
* आखिर पुस्तक होता क्या है ? भेदिये की भांति वह सबका भेद खोलती है ! सच, पुस्तक भेदिये का काम करती है । व्यक्ति मामूली हो चाहे बडा, वह सभी का भेद बताती है । वह कहेती है- देखो,बढई कैसा होता है । या फिर वह किसी रईसजादे को सामने खडा कर कहती हैदेखो, रईसजादा कैसा होता है । मानों यें अन्य सबसे भिन्न , अनोखे और निराले हो ! और पुस्तके योंही, बेमतलब, नहीं लिखी जाती । हर पुस्तक किसी ना किसी कि हिमायत करती है.
* “
आंसुऑं सॆ आग़ नहीं बुझाई जा सकती, केवल बाढ बढेगी !

Monday, October 22, 2007

punin and baburin - स्वाभिमानी

Punin and Baburin.
By.
Ivan S. Turgenev.
स्वाभिमानी.
लेखक : तुर्गनेव.

"स्वाभिमानी" उपन्यास रशिया के प्रसिध्ध महान लेखक "तुर्गनेव" की रचना है जिसके प्रधान नायक बैबूरिन एक प्रजातन्त्रवादी है और आगे आनेवाले निहिलिस्ट याने शुन्यवादी विचारधारा माननेवाले का पूर्वज था । जिस तरह "पिता और पुत्र"(तुर्गनेव का प्रसिध्ध उपन्यास) के बैजेरोव का गुण है वही गुण बैबूरिन मे पाया जाता है । ईस उपन्यास में बैबूरिन एक जगह कहते है--"लोग ईस आशा में दिन काट रहे है कि शायद एक दिन अवस्था सुधर जाय और हम स्वाधीनतापूर्वक रहते हुए स्वतन्त्र वायुमण्डल में स्वच्छन्दता के साथ सांस ले सकें, पर यहां तो मामला बिल्कुल उल्टा ही नजर आता है--हर तरफ हालत दिन-पर-दिन बिगडती ही जा रही है । हम निर्धनों का शोषण करके धनवानों ने हमें बिल्कुल खोखला बना डाला है । अपनी जवानी में मेने धैर्यपूर्वक सबकुछ बर्दाश्त किया । उन्होंने मुझे पीटा भी, हां, मेरे जैसे वृध्ध पुरुष को शारीरिक दण्ड दिया गया । दूसरे अत्याचारों का में जिक्र नहीं करुंगा । किंतु क्या सचमुच हमारे सामने ईसके सिवा और कोई दूसरा उपाय नहीं कि हम फिर उन पुराने दिनों की याद करें ? ईस समय नवयुवकों के साथ जैसा व्यवहार हो रहा है, उससे तो धैर्य की सीमा का भी अतिक्रमण हो जाता है । उससे सहनशीलता की हद हो चुकी है ।" ईस उपन्यास का हिन्दी रुपांतर जगन्नाथप्रसाद मिश्र ने किया है.
*"तुम उसे अपनी दरियादिली के कारण रखते हो ?"
"जी नहीं, न्याय के कारण, क्योंकि एक निर्धन व्यक्ति का यह कर्तव्य है कि वह दूसरे निर्धन की सहायता करे ।"
"सचमुच ! यह पहला मौका है, जब मैने यह बात सुनी है । अबतक तो मेरा भी यही ख्याल था कि यह काम धनवान व्यक्तियों का है ।"
"यदी धृष्टता न समझी जाय तो मैं कहूंगा कि धनवान व्यक्तियों के लिए यह एक मनोरंजन का साधन है, किन्तु हमारे जैसे लोगों के लिए तो..."
* जीवन में अशांति के भय निरन्तर लगे ही रहते है, आत्मा विभ्रांत बनी रहती है ।...
* किंतु जब कोई व्यक्ति बनावट से विह्वल होकर बातें करने लगता है, उस समय उसकी भाषा भी अधिकाधिक प्रांजल हो उठती है ।
* निर्धनों का स्वभाव ही यह हुआ करता है कि उनके मस्तिष्क जल्दी उत्तेजित हो जाते है ।
* "मै किसी रईस अर्थात धनवान के आने पर विशेष प्रसन्न नहीं होता " बैबूरिन ने कहाँ.
* "जीनो", बैबूरिन ने विचारपूर्ण स्वर में फिर कहना शरु किया, "एक ऎसा बुध्धिमान मनुष्य था, जिसका कथन था कि कष्ट सहन करना कोई पाप नहीं है, क्योंकि सहनशीलता सभी वस्तुओं पर विजय प्राप्त करती है, और ईस संसार में अच्छी चीज एक ही है, वह है न्याय । पुण्य भी न्याय के सिवा और कुछ नहीं है ।"
* यह तो एक जानी हुई बात है कि किसी खतरनाक खाई-खन्दक के ऊपर बिलकुल किनारे पर चलना स्त्रियों का एक प्रिय कौतुक है ।
* "सर्दी से ठिठुरकर मरने की अपेक्षा जलकर मरना कहीं अच्छा है ! तुम...अपनी नेक सलाह अपने पास ही रखो ।
* साईबीरिया से मानसी ने मुझे लिखा था--"बैबूरिन नहीं चाहता था कि मै उसके साथ यहां आऊं, क्योंकि उसके विचारों के अनुसार किसीको अपने व्यक्तित्व का दूसरे के लिए बलिदान नहीं करना चाहिए । हाँ, अपने उदेश्य के लिए बलिदान करना दूसरी बात है.

Online Read Novel : Punin and Baburin.


Labels:

Wednesday, October 17, 2007

The Kreutzer Sonata प्रेम या वासना

The Kreutzer Sonata.
By.
Leo Tolstoy.

प्रेम या वासना.
लेखक : लियो टोलस्टाय.

* "यह उतना ही नामुमकिन है जितना यह उम्मीद करना कि जब किसी छकडे में मटर लादे जा रहे हों तो पहले से चुनी हुई दो मटर की फलियाँ एक-दुसरे के पास-पास ही गिरेंगी । ईसके अलावा मर्द और औरत के सबंध में संभावना के सिध्धांत की बजाय थकान का सिध्धांत ज्यादा काम करता है । जीवन-भर एक ही मर्द या औरत को प्रेम करना- वाह, यह तो ऎसा ही है जैसे किसी मोमबती से जीवन-भर जलने की उम्मीद की जाए !
* मै हर औरत के लिए और औरत की नग्नता के लिए तडपता था । एकांत में मेरे विचार पवित्र नहीं थे । मुझे वही यातनाएं झेलनी पडी । जिन्हे हमारे निन्या-नवे फीसदी लडके झेलते है ।
* एक औरत को कलंकित करने की जिम्मेदारी में मेरा हिस्सा था । मैनें अपने बडे-बुढों से कभी नहीं सुना कि मैनें जो काम किया वह गलत था । न ही आज-काल यह बात सुनने में आती है । यह सच है कि दस ईश्वरीय आदेश हमें बताते है कि यह काम गलत है, परंतु हम वे दस आदेश सिर्फ ईसलिए सीखते है ताकि बाईबल की परीक्षा में हम पादरी को सही जवाब दे सके, और फिर यह ज्ञान उतना महत्वपूर्ण भी नहीं है, जितना कि लेटिन भाषा में शर्तवाले वाक्यांशों में "उत" का ईस्तेमाल.
* विवाह हमेंशा ऎसे लोगों में होती है और होती आई है, जो विवाह में कोई ने कोई पवित्रता ढूंढते है, ऎसी पवित्रता जिसमें कर्तव्य हों और वे उन कर्तव्यो के लिए ईश्वर के प्रति जिम्मेदार हों । ऎसे ही लोगो में ये विवाहे होती है, परंतु हमारे वर्ग में नहीं होती । हमारे लोग विवाह में शारीरिक संबध के अलावा और कोई चीज नहीं देखते, ईसलिए उनका विवाह या तो एक मजबूरी साबित होती है या धोखा । ईन दोंनो पापों में धोखा अपेक्षाकृत छोटा पाप है । पति और पत्नी दूसरों को यह धोखा देते है कि उनका प्रेम एकनिष्ठ है, जबकि दरअसल वे वफादार नहीं है । यह धोखा बुरी चीज हैं, फिर भी ईसे सहन किया जा सकता है । परंतु आम तौर पर ऎसा होता है कि पति-पत्नी सारा जीवन एक-दुसरे के साथ रहने की जिम्मेदारी उठाते है, और एक महीने के बाद एक-दूसरे से नफरत करने लगते है, एक-दूसरे से अलग होने के लिए बेचैन हो उठते है, फिर भी एकसाथ रहते है । ईसका परिणाम वह अकथनीय मर्मांतक पीडा होती है, जिससे मजबूर होकर लोग शराब पीते है,आत्महत्या करते है, कत्ल करते है, स्वय़ं विष खाते है या एक-दूसरे को विष देते है ।
* अपनी खोई सरलता के लिए, औरतों के साथ उस सबंध के लिए, जो हमेंशा के लिए नष्ट हो गया था । हां, एक प्राकुतिक, सीधा-सादा सबंध हमेंशा के लिए नष्ट हो गया था । उस समय के अत: से यह सबंध पवित्र नहीं रहा, न रह ही सकथा था । जिसे लंम्पट कहते है, मै वह बन गया । लम्पट व्यक्ति की शारीरिक देखाव शराबी, सिगरेट पीनेवाले या नशेबाज जैसी होती है । जिस तरह शराबी,सिगरेट पीनेवाला या नशेबाज नोर्मल व्यक्ति नहीं होता, उसी तरह वह व्यक्ति भी, जो सुख के लिए बहुत-सी औरतो के साथ सो चुका है, नोर्मल व्यक्ति नहीं होता । वह हमेंशा के लिए खराब हो जाता है, उसीको लंम्पट कहते है। जिस तरह किसी शराबी या नशेबाज को उसके चेहरे और व्यवहार से पहचाना जा सकता है उसी तरह लंम्पट व्यक्ति को भी पहचाना जा सकता है । लंम्पट व्यक्ति अपने गुनाह के साथ लड सकता है, उसपर काबु पा सकता है, परंतु जीवन में फिर कभी वह औरतो के साथ एक पवित्र,उज्जवल और सीधे-सादे सबंध को नहीं जान सकता--भाई जैसे सबंध को । लंम्पट व्यक्ति किसी नौजवान औरत को जिस द्रष्टि से देखता है, उसीसे वह पहचाना जाता है । और मैं लंम्पट बन गया, और तभी से लंम्पट बना रहा । ईसीसे मेरा सर्वनाश हुआ ।
* सब उपन्यासों में हीरो की भावनाओं का, फूलों का और उस तालाब का विस्तृत वर्णन रहता है, जिसके किनारे हीरो टहलता है । परंतु किसी नौजवान औरत के लिए सुंदर हीरो के मन में जो महान प्रेम उत्पन्न होता है, उसका वर्णन करते हुए उपन्यासकार यह नहीं बताते कि विवाह से पहले हीरो ने अपना जीवन कैसे बिताया--वे चकलों की वेश्याओं, घरों की नौकरानियों , बावर्चिनों और दूसरे लोगों की पत्नियों का जिक्र नहीं करते, जिनके साथ हीरो का सम्बन्ध रह चुका है । और जब भी ऎसे अश्लील उपन्यास लिखे जाते है, तो उन्हे उन लोगों के हाथों में नहीं दिया जाता, जिन्हे ऎसी पुस्तको की सबसे ज्यादा जरुरत है--यानी निर्दोष नौजवान युवतियों के हाथों में । पहले तो तो बडे-बूढे नौजवान युवतियों को ईस भ्रम में रखते थे कि दुराचार नाम की कोई वस्तु ही नहीं होती, जबकि हमारे नगरों और यहां तक कि गांवो की भी आधा जीवन ईसीमें पसार होता है ; अत: में वे लोग ईस दिखावे के ईतने आदी हो गए कि अंग्रेजो की तरह वे भी प्रमाणिकता से ईस बात में विश्वास करने लगे कि एक ऊंचे नैतिक आदर्शोवाले संसार में रहनेवाले वे ऊंचे नैतिक आदर्शो के लोग है, और बेचारी नौजवान युवतियों ईस झूठ में गम्भीरता से विश्वास करती है ।
* वह जानती है कि हम मर्द उदात्त भावनाओं की जो बातें करते है, वे झूठी होती है ; हम सिर्फ शरीर को चाहते है । ईसलिए हम औरत के गुनाहों को तो माफ कर सकते है परंतु कुरुप,ढीले-ढाले कुरुचिपूर्‍र्ण गाउन को हरगिज् माफ नहीं कर सकते । वेश्या ईस बात के प्रति सचेत रहती है परंतु जानवर की तरह किसी भी मासूम नौजवान लडकी को ईस बात का सहज ज्ञान होता है ।
* मैने पूछा, "परंतु मानवजाति फिर कैसे बनी रहेगी ? "
"मानवजाति कैसे बनी रहेगी ?" उसने व्यंग-भरी आवाज में ईस तरह दुहराया जैसे उसे पहले से ही विश्वास था कि यह आम और लज्जाप्रद प्रश्न पूछा जाएगा । "बर्थ कंट्रोल का प्रचार आसान है,ताकि अंग्रेज रईसों के पेट भरने के लिए चीजों की कमी न हो, बर्थ कंट्रोल का उपदेश आसान है, ताकि अप्रिय परिणामों के बगैर ही व्यक्ति मजे लूट सके ; परंतु ज्योंही कोई नैतिकता के नाम पर बर्थ कंट्रोल का प्रचार करने के लिए मुंह खोलता है तो--औह, कितना शोर मचाया जाता है ! यदी एक या दो दर्जन व्यक्ति फैसला करें कि वे सूअरों जैसी जीवन बसर करके ऊब गए है, तो प्रश्न पूछा जाता है कि मानवजाति कैसे बनी रहेगी ?
* "औरतो का शासन से आपका क्या अर्थ है ? मैने पूछा, "न्याय तो मर्द को ज्यादा अधिकार देता है ।"
"हां,हां, यही बात है । उसने बीच में टोटक्कर कहा, "मै आपको यही बताना चाहता था । ईसीसे आपको औरतो का शासन के असाधारण व्यापार का कारण समझ में आएगा ; औरत अपमान के निम्नतम स्तर पर पहुंची हुई है, फिर भी मर्द पर शासन करती है, जिस तरह यहूदियों को जो अत्याचार सहना पडता है उसकी कसर वे अपने पैसे की ताकात से पूरी कर लेते है । यहूदी कहते है, "अच्छा, तो तुम चाहते हो हम सूदखोर के सिवा कुछ न रहें, क्यों ? अच्छी बात है, हम सूदखोर बनकर ही तुम्हारे ऊपर शासन करेंगे । औरतें कहती हैं, "आह, तुम चाहते हो हम सिर्फ विलास की सामग्री बनी रहें ? अच्छी बात है, विलास की सामग्री बनकर ही हम तुम्हें अपना गुलाम बनाएंगी ।' औरत के अधिकारों से वंचित रहने का अर्थ यह नहीं कि उसे वोट देने का अधिकार या जज बनने का अधिकार नहीं--ईन कामों को करना किसी अधिकार का सूचक नहीं । सेकस का जीवन में औरत को यह बराबरी का अधिकार नहीं मिला कि वह अपनी ईच्छा से किसी व्यक्ति से प्रेम करे या असंमति कर दे, उसे यह अधिकार भी नहीं कि पसंद की जाने की बजाय वह खुद किसी मर्द को पसंद करे ।
"आप कहेंगे कि यह मर्दो के साथ ज्यादती है । अच्छी बात है । तब मर्दो को भी यह अधिकार हासिल नहीं होना चाहिए । ईस समय औरतों को उसे अधिकार से वंचित रखा गया है जो मर्दो को हासिल है । ईसलिए ईस अधिकार के छीने जाने की कसर औरत मर्द की वासनाओं को उभारकर पूरा करती है, वह उन्हें ईस हद तक उभार देती है, और ईसी जरिये उसपर शासन करती है कि मर्द का किसी औरत को चुनना केवल एक औपचारिकता रह जाती है, असली चुनाव तो औरत करती है । अपना उद्देश्य की पूर्ति के साधन एक बार मिल जाने पर वह ईसका फायदा उठाती है और सब लोगों पर अपनी ईस भयंकर शक्ति का प्रयोग करती है ।"
"अंत यह भयंकर शक्ति किस वस्तु में रहती है ?" मैने पूछा ।
"किस वस्तु में ? हर वस्तु में, हर जगह । किसी भी बडे शहर की दुकानों में जाकर देखो । लाखो हाथ--असंख्य हाथ उन वस्तु को बनाने में महेनत करते है जो उन दुकानों में सजी हुई हैं । और जरा देखिए ! क्या दस में से नौ ऎसी दुकानो में मर्दो के प्रयोग की कोई वस्तु मिल सकती है ? जीवन की हर विलासिता की सामग्री की मांग और उसका उपभोग औरतें करती है । फेक्टरियों की गिनती कीजिए । उनमें से अधिकांश व्यर्थ के गहने, गाडियां, फर्निचर और औरतों के लिए तरह-तरह का सामान तैयार करने मे लगी है । करोडो व्यक्ति, गुलामों की कई पीढियां, औरतों की सनकों को संतृष्ट करने के लिए ईन क्रृर फैक्टरियों में काम करके थकान से चूर हो जाते है । रानियो की तरह औंरतो ने मानवजाति के नौ बटे दस हिस्से को गुलामों की तरह महेनत करने के लिए मजबूर किया है । ईसलिए, क्योंकि मर्दो ने उन्हे अपमानित किया है और उन्हें बराबरी के अधिकार नहीं दिए, ईसलिए वे हमारी वासनाओं को जागरित करके हमें फंदे में फसाकर अपना बदला लेती है । हां, सारी बातों की यही कारण है ।औंरतो ने अपने-आपको मर्दो की वासना जगाने का ईतना प्रभावशाली साधन बना लिया है कि उनकी प्रस्तुती में मर्द अपने चित की स्थिरता को कायम नहीं रख सकतें । औरत के निकट आते ही मर्द जड हो जाता है, जैसे किसी नींद की दवा का असर हो । पहले जब मैं किसी औरत को नाच के गाउन में सजा देखता था, तो मेरे मन में बेचैनी होती थी और मै दुम हिलाने लगता था । अब मुझे भय महसूस होता है । मुझे ऎसी औरत खतरनाक और गैरकानूनी वस्तु मालूम होती है । फौरन जी में आता है कि मै चिल्लाकर सहायता के लिए पुलिस को बुलाऊं और मा6ग करु कि उस खतरनाक वस्तु को वहां से हटाकर हवालात में बंद कर दिया जाए । आप हंस रहे है ? वह झल्लाया ।
"यह हंसी की बात नहीं । मुझे विश्वास है कि कभी ऎसा समय आएगा-शायद जल्द ही आएगा-जब लोग ईस बात को समझेंगे और उन्हे ताज्जुब होगा कि कभी ऎसा समाज भी था, जिसने औरतों को छूट दे रखी थी कि वे मर्दो की वासनाओं को जागरित करने के साफ ईरादे से सज-धजकर समाज की शांति को भंग करती थी । यह तो मर्दो के रास्ते पर फंदे बिछाने जैसी वस्तु हुई । उससे भी बदतर ! भला ऎसा क्यों है कि जुए के खेल पर पाबंदी है परंतु मर्दो की वासना भडकानेवाली वेश्याओं जैसी सजधज और पोशाकों पर कोई पाबंदी नहीं, जो हजारगुना ज्यादा खतरनाक है !"
* मै एक खंडहर हूं, नष्ट हो चुका हूं । परंतु मेरे पास एक वस्तु है, वह है ज्ञान । हां, मुझे वे बातें मालूम है, जिन्हें सीखने में दूसरों को बहुत समय लगेगा ।
"मेरे बच्चे जिन्दा हैं और बडे होकर असभ्य और बर्बर बनेंगे, दूसरे सभी लोगों की तरह । मै उनसे तीन बार मिला हुं । मै उनकी कोई सहायता नहीं कर सकता । मैं दक्षिण की तरफ जा रहा हूं । वहां मेरा एक छोटा-सा मकान और बाग है ।
* "किसानों और मजदूरों को बच्चों की जरुरत महसूस होती है ; बच्चों को खिलाना चाहे उनके लिए कितना ही मुश्किल क्यों न हो, वे उन्हे जरुरी समझते है ; ईसलिए उनके दाम्पत्य जीवन के औचित्य का आधार है । परंतु हम कुलीन लोग बिना जरुरत के ही बच्चे पैदा करते है । वे फिजूल की परेशानी पैदा करनेवाले जीव है उनपर खर्च पडता है । विरासत का दावा करनेवाले वे अवांछनीय प्राणी है, एक बोझ है ।

Read Online this Novel : The Kreutzer Sonata


Labels:

View blog authority
Free Counter
Free Counter

XML
Google Reader or Homepage
Subscribe
Add to My Yahoo!
Subscribe with Bloglines
Subscribe in NewsGator Online

BittyBrowser
Add to My AOL
Convert RSS to PDF
Subscribe in Rojo
Subscribe in FeedLounge
Subscribe with Pluck RSS reader
Kinja Digest
Solosub
MultiRSS
R|Mail
Rss fwd
Blogarithm
Eskobo
gritwire
BotABlog
Simpify!
Add to Technorati Favorites!
Add to netvibes

Add this site to your Protopage

Subscribe in NewsAlloy
Subscribe in myEarthlink

Add to your phone


Feed Button Help
Create Social Bookmark Links
Locations of visitors to this page